मेरे माता पिता के लिये पूरी यात्रा का अनुभव बड़ा ही सुखद रहा है।

जब से सरदार वल्लभ पटेल की गगनचुम्बी मूर्ति ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ के अनावरण होने की बात शुरू हुई थी तभी से इस परियोजना को लेकर कांग्रेसीवामीमुल्ला गिरोह, बड़े सुनियोजित तरीके से इसके कुप्रचार में संलिप्त रहा है। इन लोगो द्वारा बिना धरातल की वास्तविकता जाने, एक से एक भ्रामक तथ्यों व आंकड़ों को हवा देकर लोगो को आशंकित व दिग्भ्रमित कर, इसकी प्रसांगिकता पर ही प्रश्न उठाये है। ऐसे में मैंने जब एक प्रत्यक्षदर्शी के द्वारा अंग्रेज़ी में लिखे अनुभव को पढा तो यह मेरे लिये आवश्यक हो गया कि मैं उसको हिंदी में अनुवाद करके लोगो तक स्टेचू ऑफ यूनिटी के उस पक्ष को पहुंचाऊं जो लोगो ने न देखा है और न ही सुना है। Abhijit Kothiwale की माँ अभी पिछले दिनों स्टेचू ऑफ यूनिटी देख कर आई है और जो उनको अनुभव था, उसी को अभिजीत ने लिखा है।
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मेरे माता पिता की स्टेचू ऑफ यूनिटी की यात्रा और परियोजना की अद्भुत्ता:

मेरे माता पिता कल, लोकार्पण के ठीक 3 दिन बाद ही, ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ को देखने गये थे। वहां से लौट कर मेरी माँ ने आज प्रातः, मुझे अपनी यात्रा के संस्मरण को बताते हुये कहा कि तुम लिखते हो इसलिये मुझको इस परियोजना के सारे पहलुओं के बारे में जानना जरूरी है।

मैंने स्टेचू ऑफ यूनिटी को लेकर जो उनका अनुभव सुना है, उसीको मैं इस आशय से लिपिबद्ध कर रहा हूँ की लोग इसको पढ़ेंगे और इसे आगे अग्रसारित करेंगे ताकि स्थानीय लोगो के जीवन पर, स्टेचू ऑफ यूनिटी परियोजना के पड़े विस्मयकारी प्रभाव के बारे में जान सके।

इस परियोजना को लेकर भारत के लिब्रलों ने आक्षेपों की बौछार लगा रक्खी है। कोई इसे पैसे का दुरुपयोग, कोई दुष्ट आरएसएस/बीजेपी, मोदी द्वारा नेहरू को नैपथ्य में ठकेलने का कुत्सित प्रयास बता रहा है और कुछ तो यह खबर दे रहे है कि एक तरफ तो स्थानीय लोगो को पीने का पानी नही मिल रहा है और दूसरी तरफ एक मूर्ति पर पैसा बहाया जारहा है। लेकिन मेरी मां को जो वहां जाकर प्रत्यक्ष अनुभव हुआ है वह इस परियोजना की अद्भुत्ता की अलग ही कहानी कह रहा है।

सर्वप्रथम तो यह कि मूर्ति अपने आप मे ही विस्मयकारी व प्रेरणदायक है, जिसके बनने के इतिहास से लेकर, उसको बनाने में लगे सामानों के बारे में बहुत कुछ पहले ही लिखा जाचुका जा। पर्यटकों के लिये इस मूर्ति तक पहुंचने के लिये चौड़ी चौड़ी सड़को का निर्माण किया गया है और मूर्ति प्रांगड़ का पूरा इलाका ही किसी विदेशी पर्यटन स्थल की अनुभूति देता है।

मूर्ति देखने की टिकट 500 रुपये है लेकिन आप 30 रुपये अतरिक्त देकर बस की सवारी कर सकते है। वहां सारी बसे आधुनिक व एयर कंडिशन्ड है, जिसमे बैठ कर आप इस विशाल
प्रांगण में घूम सकते है। वहां मूर्ति के सबसे नीचे तले पर म्यूजियम है। वहां भूमितल से ट्रेवेल्टर्स, एस्केलेटर्स और लिफ्ट है जिनके द्वारा पर्यटकों को प्रदर्शनी दीर्घा तक ले जाया जाता है। यह दीर्घा, 45वीं मंजिल पर मूर्ति के सीने में स्थित है और इस ऊंचाई से सरदार सरोवर बांध बहुत छोटा सा दिखता है।

मूर्ति का पूरा प्रांगण आलीशान व पूरी तरह स्वच्छ है और वहां के शौचालय बड़े उत्कृष्ट है। वहां पर्यटकों के लिये उत्तम भोजन की व्यवस्था है, भोजन के लिये अतिविशाल फ़ूड कोर्ट है जहां विविध प्रकार के उच्चकोटि के व्यंजन बराबर मिलते रहते है। मेरे माता पिता के लिये पूरी यात्रा का अनुभव बड़ा ही सुखद रहा है।

अब हम आते है इस मूर्ति की परियोजना के उस पक्ष पर जो अद्भुत है। लोगो को यह जानना आवश्यक है कि वहां काम करने वाले सारे लोग स्थानीय और अगल बगल के क्षेत्र के है, जो बेहद पिछड़े व गरीब है। मूर्ति प्रांगड़ का सारा व्यपार व दुकानदारी स्थानीय लोगो द्वारा ही संचालित होती है। यहां जैसे जैसे लोगो का आना जाना बढ़ेगा वैसे वैसे यह मूर्ति स्थल, आर्थिक रूप से और विकसित होता जायेगा। इतना ही नही लोगो को इस स्थान के लिये आकर्षित करने के लिये भविष्य में और आकर्षण भी जुड़ते जायेंगे।

यहां पर, ग्रे यूनिफार्म पहने युवा लड़के लड़कियां, गाइड के रूप में काम करते है, जो सब यही के स्थानीय गरीब, किसान और आदिवासी परिवारों से आते है। इस परियोजना के अंतर्गत ‘प्रशिक्षण केंद्र’ खोले गये है, जहां स्थानीय लोगो को उनकी क्षमता व रुचि के अनुसार, उनको तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाता है। वहां जो युवा गाइड का काम करते है, उन्हें यदि गुजराती आती है तो 25000 हजार, उसके साथ हिंदी आती है तो 35000 हजार और अंग्रेजी आती है तो 45000 हजार प्रति माह मिलते है। इतना ही नही, यह परियोजना क्योंकि केंद्र संचालित है इसलिये उनकी नौकरियां सरकारी नौकरी होती है। इस परियोजना के अधिकारी, लगातार इन क्षेत्रो में घूमते और उन लोगो को चिन्हित करते है, जिनको भिन्न भिन्न सेवा के लिये उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करना है।

इन युवाओं और अन्य स्थानीय लोगो ने बताया कि जब तक यह परियोजना नही आई थी तब तक उनकी ज़िंदगी भटकाव की और निरुद्देश्य थी लेकिन अब उनके पास नौकरी है, प्रशिक्षण के लिये शानदार सुविधा है और साथ मे बाहर शहर से आये लोगो से जो उनका सम्पर्क हुआ उसने उनका दुनिया व ज़िन्दगी के प्रति द्रष्टिकोण ही बदल दिया है। इस स्टेचू ऑफ यूनिटी की परियोजना ने उन लोगो को जबरदस्त सुअवसर प्रदान किया जा।

मेरे माता पिता का जो युवा गाइड था उसने बताया कि स्थानीय लोग इस परियोजना से बेहद प्रसन्न है क्योंकि इसने उनके जीवन को बदल डाला है। सभी लोगो का मोदी के प्रति विशेष अनुराग है और वे उनकी प्रशंसा करते नही थकते है। मेरे माता पिता जिस बस में बैठ कर घूमे थे, उन्होंने उसके बस ड्राइवर को, अपने किसी जान पहचान वाले को यह मोबाइल पर कहते सुना, कि जल्दी से आकर नौकरी(ड्राइवर) के लिये आवेदन कर दो और साथ मे ड्राइविंग लाइसेंस लाना मत भूलना! यहां का पूरा वातावरण सुअवसरों और आशाओं से भरा हुआ है।

इस परियोजना के लिये जिन लोगो की जमीन का अधिग्रहण किया गया था उनको दूसरी जगह जमीन और पक्का मकान दिया गया है। मेरे माता पिता ने जिस टैक्सी को घूमने के लिये की थी, उसका ड्राइवर भी उन्ही लोगो मे से एक है जिसकी ज़मीन अधिग्रहित की गई थी। उसने बताया की उसको जो जमीन मिली थी उसमे बड़ा सा गड्ढा था, जिसको सरकार ने ही भरवाया और समतल किया है।

यहां मूर्ति के बगल में, नदी के तट पर, 2 टेंटो के शहर बसाये गये है, जिन्हें पर्यटक किराये पर लेकर उसी में रह सकते है। यहां रात को जो लेज़र शो होता है उसको देखना अपने आप मे एक अद्भुत अनुभव है।

स्टेचू ऑफ यूनिटी की एक खास बात यह भी है कि आप पहले से ही टिकट की ऑनलाइन बुकिंग करा सकते है और टिकट की लाइन में खड़े होने से बच सकते है। यदि इस परियोजना को संपूर्णता में देखे तो यह भारत का प्रथम वैश्विक पर्यटक स्थल है जिसका निर्माण रिकॉर्ड समय मे हुआ है। इस ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ ने जहां सरदार वल्लभ भाई पटेल के महामात्य का परिचय लोगो को कराया है वहीं पर लाखों स्थानीय लोगो के जीवन को भी बदल डाला है।

इस शानदार उपलब्धि के लिये प्रधानमंत्री जी और गुजरात की सरकार दोनो का ही अभिनन्दन है! वैसे तो नकरात्मक लोग मूर्ति को लेकर चिल्लपों करते ही रहेंगे लेकिन काम, काम होता है और उत्कृष्टता, उत्कृष्टता होती है।

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