आज अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप का द्वीपीय समूह भारत मे है तो उसका एक मात्र श्रेय सरदार पटेल को जाता है

आज सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्मदिन है और यह हर्ष का विषय है कि आज ही के दिन उनकी मूर्ति का लोकार्पण है, जो विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है। मैंने पूर्व में सरदार पटेल पर कई बार लिखा है, जहां मैंने गांधी सन्दर्भ में उनकी आलोचना की है वही आधुनिक भारत के निर्माण व उसको स्थायित्व प्रदान करने के लिये प्रशंसा भी की है।

मेरा मानना है कि लोगो को सरदार पटेल के गुण व भारत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, के आगे अवगुण अपवाद स्वरूप भी लेना चाहिये क्योंकि कोई भी मानव पूर्ण नही हो सकता है। आज इसी अवसर पर मैं पूर्व के लिखे एक लेख को फिर से पुनः अवतरित कर रहा हूँ।

सरदार वल्लभभाई पटेल जी का आज जन्मदिन है। उनको स्वर्गवासी हुये लगभग सात दशक होने को आरहे है लेकिन आज भी भारतीय जनमानस की चेतना में उनकी स्मृति जाग्रत अवस्था मे है। यह एक विचित्र विरोधाभास है कि जिस महान व्यक्ति के दृढ़ संकल्पों से भारत को आज का यह स्वरूप मिला है उनके जीवनकाल मे, जो स्वतंत्रता व बंटवारे का काल था, उनकी दूरदर्शिता और स्वतंत्र भारत को लेकर उनकी परिकल्पना पर बहुत कम लिखा व जाना जाता है।

ऐसा नही है कि सरदार पटेल के जीवनकाल की घटनायें कही लिपिबद्ध नही है लेकिन नेहरू से लेकर सोनिया गांधी की कांग्रेस की सरकारों ने उसे कभी भी सामने नही आने दिया और जो लोगो ने सरदार पटेल के जीवन की घटनाओं को अपने संस्मरणों में लिपिबद्ध भी किया, उसको शासको ने हमेशा नजरअंदाज किया है ताकि जनमानस की स्मृति से सरदार पटेल ओझल हो जाये। कांग्रेस के इस कुत्त्सित प्रयास में भारत के वामपंथी इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने भी अपना पूरा योगदान दिया जिसका परिणाम यह हुआ है कि 70 के बाद कि पीढ़ी के लिये सरदार वल्लभभाई पटेल, क्लास की इतिहास की किताब में 2 पन्नो में समिट के रह गये है।

मेरा तो मानना है कि पटेल जी के पर जितना भी शोध किया जाय वह कम है क्योंकि उसमे असीम सम्भावनाये है, जो भारत की आगामी पीढ़ी के लिये जानना अनिवार्य है।

हम जब भी सरदार पटेल जी की बात करते है, हम उनके द्वारा असंभव सा लगने वाला, 562 प्रिंसली स्टेट का भारत मे विलय कराये जाने को याद करते है लेकिन सरदार का योगदान इससे भी बड़ा था।

आज अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप का द्वीपीय समूह भारत मे है तो उसका एक मात्र श्रेय सरदार पटेल को जाता है। लक्षद्वीप समूह प्रशासनिक रूप से मद्रास प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आता था लेकिन वह एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था। हालांकि बंटवारे में लक्षद्वीप को लेकर मुस्लिम लीग ने कोई दावा नही किया था लेकिन सरदार पटेल दूरदर्शी थे और वे जिन्नाह की कलुषिता मानसिकता को बहुत अच्छी तरह समझते थे। इसलिए उन्होंने दूरदर्शिता से काम लिया और बंटवारे की तमाम उलझनों के बीच, स्वतँत्रता की घोषणा के साथ ही, भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री की धारिता में, भारतीय नौसेना के जहाज को लक्षद्वीप पर भारतीय झंडा फहराने के लिये भेज दिया था। जैसा सरदार पटेल ने अनुमान लगाया था ठीक उसी तरह पाकिस्तान ने भी द्वीप पर कब्ज़ा करने के लिये अपना नौसैनिक जहाज भेजा था लेकिन जब उन्होंने ने वहां भारतीय नौसेना के जहाज को देखा, तो बिना किसी प्रतिवाद के वापिस चले गये थे।

इसी तरह सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर भी उन्होंने दूरदर्शिता दिखाई थी। पटेल अच्छी तरह जानते थे कि नेहरू का पाश्चात्य की गढ़ी धर्मनिरपेक्षता के प्रति अंधअनुराग उनको यह नही करने देगा और यह बात शासकीय लेखों में लिखा भी है कि नेहरू ने इसका विरोध किया था। लेकिन पटेल इसके लिये पहले से ही तैयार थे जिसका उल्लेख सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन पटेल ने, अपनी डायरी में किया है। मणिबेन ने उसमे 20 सितम्बर 1950 को लिखा है कि सोमनाथ मंदिर के पुनरुत्थान को लेकर जब नेहरू ने खुला विरोध किया तो सरदार पटेल ने उनसे कहा कि सोमनाथ मंदिर का कार्य एक ट्रस्ट द्वारा इकट्ठा किये गये 30 लाख रुपये से हो रहा, जो इस कार्य के लिये पहले से ही इकट्ठा कर लिया गया है। इसमें शासकीय कोष का कोई भी योगदान नही है इसलिये प्रधानमंत्री का इसमे हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नही है।

सरदार पटेल, भारत के वामपंथियों को शुरू से पहचानते थे और वे उनपर कभी भी विश्वास नही करते थे। मणिबेन 13 सितम्बर 1948 को लिखती है कि पटेल जी ने नेहरू के विशेष सहायक एम ओ मथाई को हिदायत दी कि यदि हमे भारत का एक राष्ट्र के रूप में र्निर्माण करना है तो उसमें वामपंथियों की कोई जगह नही होनी चाहिये।

इसी तरह मणिबेन आगे लिखती है कि नेहरू, मुस्लिम वर्ग को खुश रखने की नीयत से, हैदराबद नवाब के खिलाफ किसी कड़ी कार्यवाही के विरुद्ध थे, जो सरदार पटेल को अस्वीकार्य था। जब नेहरू ने पटेल पर दबाव बनाने के लिये अपने मित्र और भारत के गवर्नर जर्नल सी राजगोपालाचार्य का उपयोग किया तब पटेल ने राजा जी से कहा कि, ” मुझे कोई भी ताकत इस नासूर को हटाने से नही रोक सकती है, चाहे इसके लिये मुझे कड़ी से कड़ी कार्यवाही ही क्यों न करनी पड़े। नेहरू के लिये श्रेष्ठतर यही होगा कि वे अपनी परिसीमा में ही रहे।”

आगे उनको कहा कि, “मैं नही चाहता हूं कि इस नासूर(हैदराबाद) को भारत के बीचों बीच को पनपने देने के लिये, आगे आने वाली भारत की पीढ़ी, उनको दोषी ठहराये और श्राप दे। एक तरफ पश्चिमी पाकिस्तान, दूसरी तरफ पूर्वी पाकिस्तान है और बीच मे हैदराबद को लेकर एक पैन इस्लामिक ब्लॉक बना कर, दिल्ली पर फिर से मुगलिया सल्तनत स्थापित करने के सपने को पूरा नही होने दिया जासकता है। हम एक बार हैदराबद में घुस जायेगे तो यह अंतराष्ट्रीय मामला बनने का मामला ही समाप्त हो जायेगा। यह गृहमंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है और कब तक आप और नेहरू मेरे मंत्रालय को किनारे कर के रह सकते है?”

वास्तव में तटस्थ आंकलन किया जाय तो नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के कुत्सित प्रयासों के बाद भी यदि आज का भारत जो कुछ भी बच हुआ है, वह सरदार पटेल की दूरदर्शिता का परिणाम है। जो उन्होंने हैदराबद में 1947 को देख लिया था उसे नेहरू और उसके उत्तराधिकारियों ने बिल्कुल भी नही देखा जिसके परिणामस्वरूप आज भारत मे कश्मीर, केरल, बंगाल नासूर बन कर मवाद बहा रहे है।

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