अपनी परिधियों को तोड़ते हुये, व्यवस्थापिका के क्षेत्र में अतिक्रमण करने की घृष्टता कर रही है।

आज हम भारतीय उस काल के यात्री है जहां भारतीय संविधान की छत्रछाया में पल्लवित हुआ भारत का सर्वोच्च न्यायलय सब कुछ है, बस न्याय का आलय नही लगता है। स्वतंत्रता के बाद से जिस तरह, भारत के सभी तंत्र कांग्रेसीवामी इकोसिस्टम से संक्रमित हुये, उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय भी उससे अप्रभावित नही रहा है। पूर्व में इस न्यायालय के कुछ न्यायाधीश विवादित जरूर होते थे लेकिन उनके मूल चरित्र व उनके मूल उद्देश्यों से भारत की आम जनता अपरिचित ही रहती थी।

न्यायाधीशों की भारत व उसके संविधान के प्रति निष्ठा पर कोई प्रश्न नही करता था। लेकिन 26 मई 2014 के बाद जैसे सब कुछ बदल गया है। आज मोदी सरकार के साढ़े चार वर्ष बीत जाने पर सर्वोच्च न्यायालय में बैठे माननीयों की भारत, न्याय व संविधान के प्रति निष्ठा उतनी ही कालिमय दिखती प्रतीत होती है जितना कालिमा लिये उनका गाउन होता है। यह दुख का विषय है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को लेकर जनता के बीच जो छवि बन रही है उसके उत्तरदायी स्वयं ये न्यायाधीश ही है।

उनके द्वारा पिछले वर्षों में जो लगातार निर्णय लिये गये है वे न सिर्फ विवादित रहे है बल्कि असंगत व संविधान द्वारा प्रदत्त उनके अधिकारों की परिधि को तोड़ने वाले भी है। भारत का लोकतंत्र जिस संविधान के अंतर्गत चलता है उसमे व्यवस्थापिका (संसद) व न्यायपालिका (न्यायालय) को स्पष्ट रूप से एक दूसरे से स्वतंत्र रक्खा है लेकिन हाल में यह दिखता प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय, विपक्ष व कांगीवामी इकोसिस्टम वाली मीडिया के समर्थन से, अपनी परिधियों को तोड़ते हुये, व्यवस्थापिका के क्षेत्र में अतिक्रमण करने की घृष्टता कर रही है।

जिस तरह से सर्वोच्च न्यायलय ने फ्रांस के साथ लड़ाकू विमान राफेल सौदे को लेकर मोदी सरकार के निर्णय पर प्रश्न उठाये है, वो निश्चित रूप से उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर है। सबसे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र को बिना नोटिस जारी किये, खरीदने के निर्णय की प्रक्रिया का पूरा विवरण मांग लिया, जहां उन्होंने स्पष्ट किया कि उसे कीमत और सौदे के तकनीकी विवरणों से जुड़ी सूचनाये नहीं चाहिये है।

लेकिन जब सरकार द्वारा विवरण दिया जाने लगा, हालांकि सरकार इसके लिये बाध्य नही थी, तब प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. के. कौल और जस्टिस के. एम. जोसेफ की पीठ ने अपनी ही बात से पलटते हुये सौदे की कीमत सम्बन्धी जानकारी भी मांग ली, जो कि भारत फ्रांस के बीच गोपनीयता की शर्त से बंधी हुई है। यह सौदा अंतराष्ट्रीय व्यवसायिक अचार व्यवहार से बंधा हुआ है और उसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर है।

मेरा अपना मानना है कि इस मामले में नरेंद्र मोदी जी की सरकार को सर्वोच्च न्यायालय को उसकी सीमाओं के बारे में बताते हुये टकराव लेना चाहिये था लेकिन केंद्र सरकार ने टकराव से बचते हुये, राफेल सौदे से संबंधित जानकारी सर्वोच्च न्यायालय को सीलबंद रिपोर्ट के माध्यम से दे दिया है।

अब यह तो वक्त ही बतायेगा की मोदी सरकार का, सर्वोच्च न्यायालय में बैठे न्यायाधीशों से न्याय करने की अपेक्षा कितनी फलीभूत होती है लेकिन मैं यह मानता हूँ कि इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा क्षति व्यवस्थापिका के मूलभूत अधिकारों की हुई है। मोदी सरकार ने टकराव से बचने की शर्त पर न्यायपालिका द्वारा व्यवस्थापिका में जो अवैध अतिक्रमण को स्वीकार किया है, वो लोकतंत्र के लिये अच्छे संकेत नही है।

मोदी जी को भारत की जनता से सीधे संवाद करते हुये, सर्वोच्च न्यायालय से उसके और अपने अधिकार क्षेत्र की मीमांसा करनी चाहिये क्योंकि टकराव के लिये यह काल सर्वश्रेष्ठ काल है। यह वह काल है जब मोदी जी के नेतृत्व में व्यवस्थापिका की गरिमा व विश्वनीयता उच्चत्तम स्तर पर है तो वही सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा व विश्वनीयता अपने नयूनतम स्तर पर पहुंच गयी है।

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