कुछ कल्प-कथाओं के आधार पर अत्याचार झेलने का एकतरफा नैरेटिव रचने वाले इतिहास के प्रति ऐसे उदासीन कैसे हो जाते हैं?

इतिहास में लिपिबद्ध अत्याचार जिस से नव भारत का वमियो द्वारा लिखित इतिहास मुहँ चुराता रहा है और जिसे भारतीय जनमानस की स्मृतियों से मिटाने का प्रयास भारत का सिक्युलर राजनैतिक नेतृत्व करता रहा है, उसको Manoj Shrivastava जी की धधकती लेखनी हम सबसे फिर से परिचय करा रही है।

इसको पढ़ते समय यह अवश्य याद रखियेगा की इतिहास हमे बताता है कि जो नस्ल अपने प्रताड़ित इतिहास से, अपने अविवेक व स्वार्थ के कारण, मुहँ मोडती है, उस नस्ल की ग्रीवा इतिहास तोड़ देती है।

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‘शताब्दियों के अत्याचार’

यह देश एक हज़ार वर्षों से विदेशी आक्रमणकारियों के अंतर्गत रहा है। विदेशी आक्रमण या कोई भी सत्तातिरेक हमेशा सबसे पहले समाज की बौद्धिक सत्ता पर होता आया है। आश्चर्य नहीं कि ब्राह्मणों और पुजारियों को टारगेट करके इस विदेशी प्रभुता के दौर में मारा गया। वे इतने शक्तिहीन थे कि अपने ऊपर हुए इन ऐतिहासिक अत्याचारों की सामूहिक विस्मृति के माध्यम से ही अपने जातीय अहं को बरकरार रख सकते थे। जब आप पाॅवर-पोज़ीशन में नहीं थे, तो अत्याचार कर नहीं सकते थे, उसे झेल ही सकते थे। और उन कड़वाहटों को भुलाने के लिए अपने अवचेतन को तमाम सजेस्टिविटीज के लिए तैयार रख सकते थे।

1456 में ‘कन्हाडे प्रबंध’ अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात आक्रमण के बारे में लिखता है : “आक्रमणकारी सेना ने गांव दर गांव जलाए, जमीन उजाड़ दी, लोगों का धन लूटा, ब्राह्मणों और बच्चों और औरतों को बंदी बनाया, उन्हें कोड़ों से पीटा और बंदियों को तुर्क सेवकों में बदल दिया।” ध्यान दें कैसे तुलसीदास ने इसे ‘जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं/ नगर गाउं पुर आगि लगावहिं’ वाले रावण-राक्षसों के जरिए व्यक्त किया। बेहतर होगा कि विजेताओं के वर्णन उन्हीं के शब्दों में सुनें । उत्बी कन्नौज के 10 हज़ार मंदिरों के विध्वंस के बारे में आनंदपूर्वक लिखता है: The Brahmins of Munj which was attacked next, fought to the last man, after throwing their wives and children into fire. उत्बी के इस कथन पर ध्यान दें। एक एक ब्राह्मण लड़ते हुए मरा। यह उस बेकार की गप्प से एकदम फरक है जो सोमनाथ के सिलसिले में ब्राह्मण प्रतिरोध की अनुपस्थिति के बारे में फैलाई गई है। श्रावा के बारे में उत्बी ने लिखा: The Muslims paid no regard to the booty till they had satiated themselves with slaughters of the infidels and worshippers of sun and fire. महमूद के लड़के मसूद ने 1037 में जब हांसी किले पर आक्रमण किया तो तारीख-उस-सुबुक्तिगीन का विवरण यों है : The Brahmins and other high ranking men were slain, and their women and children were held captive. फरिश्ता कांगड़ा में फिरोजशाह तुगलक की वीरता यों बखानता है : “ज्वालामुखी की मूर्तियों का सुल्तान ने विध्वंस किया, उनके टुकड़ों को गायों के मांस में मिलाकर ब्राह्मणों के गले में थैले की तरह बांध दिया।”

क्या किसी को ख्वाजा मसूद बिन साद बिन सलमान द्वारा किया गया जालंधर के युद्घ का ‘दीवान-ए-सलमान ‘ में बताया वर्णन देखने की फुरसत है : Not one Brahmin remained unkilled or uncaptured, their heads were levelled with the ground.तवारीख-ए-फरिश्ता कितने गर्व से बताती है फीरोजशाह बहमनी( 1398-99) के द्वारा किया गया 2000 ब्राह्मण स्त्रियों का अपहरण। जजिया ब्राह्मणों पर ही प्रथमतः और प्रमुखतः लगता था और उसे इकट्ठा करने वाले, पहले, करदाता के खुले हुए मुख के भीतर थूकते थे। अकबर ने इस प्रथा को खत्म किया था। इतिहासकार हसन की ” हिस्ट्री ऑफ कश्मीर ” सिकंदर बादशाह द्वारा ब्राह्मणों के नरसंहार का विस्तृत विवरण देती है।बाबर के लाहौर गवर्नर ने पुनियाल में दत्त ब्राह्मणों को चुन चुन कर मारा था। क्या आपको लगता है ” विप्र धेनु हित लीन्ह मनुज अवतार ” की बात तुलसीदास ने किसी जातीय भेदभाव के कारण लिखी थी, या इन ऐतिहासिक अनुभवों की पृष्ठभूमि में लिखी थी–जब ये ही दो सबसे ज्यादा टारगेट पर थे? जो पिटेगा, उसे ही तो बचाने आएगा अवतार।

क्या यूरोपीय साम्राज्यवादियों के आने पर ब्राह्मणों पर यह अत्याचार रुका? गोआ के पुर्तगालियों ने ब्राह्मणों का ही नरसंहार किया था। सोलहवीं शताब्दी में ही मिशनरियों ने अपने निशाने की पहचान कर ली थी। Francis Xavier ने तब लिखा था : Hindus were under the spell of the Brahmanas, who were in league with evil spirits, and that the elimination of Brahminism was the first priority in the large operation of bringing Salvation to the wretched Pagans of India. ये ज़ेवियर महाशय ब्राह्मणों पर आक्रमणों के लिए बार बार पुर्तगालियों से फौज मांगते थे। भीमा कोरेगांव की विजय के बाद अंग्रेजों ने ब्राह्मणों के क्या हाल किए थे? क्या हम इन लोगों को आधुनिक युग का सूत्रपात करने वाला कहेंगे? क्या पेरियार के वक्त ब्राह्मणों पर हिंसक आक्रमण कर उन्हें सामूहिक पलायन ( माॅस माइग्रेशन) के लिए वैसे ही बाध्य नहीं कर दिया गया जैसे काश्मीरी पंडितों को कर दिया गया? गांधी जी की हत्या के बाद महाराष्ट्र के ब्राह्मणों के विरुद्ध हिंसाचार को क्या किसी ने याद रखा है जबकि इंदिरा जी की हत्या के बाद सिक्खों ने जो झेला, वैसा ही तब महाराष्ट्र में ब्राह्मणों के साथ हुआ था।

कुछ कल्प-कथाओं के आधार पर अत्याचार झेलने का एकतरफा नैरेटिव रचने वाले इतिहास के प्रति ऐसे उदासीन कैसे हो जाते हैं?

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